माँ सिद्धिदात्री

नवरात्रों की कथायें
नवरात्रि में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा होती है । इन रूपों में अन्तिम स्वरूप माँ सिद्धिदात्री का है । सिद्धिदात्री का अर्थ है सिद्धियां प्रदान करने वाली । जैसा कि नाम से स्पष्ट है, माता सब सिद्धियाँ अपने निष्ठावान सच्चे साधकों को प्रदान करती हैं ।आध्यात्मिक साधना के क्षेत्र में साधक कुछ असाधारण शक्तियों को प्राप्त करता है, जिन्हें सिद्धियां कहते हैं । मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, आठ सिद्धियां होती है – 1. अणिमा, 2. लघिमा, 3. प्राप्ति, 4. प्राकाम्य, 5. महिमा, 6. गरिमा, 7. ईशित्व और 8. वशित्व। जबकि ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खंड में अठारह सिद्धियों का उल्लेख मिलता है ।
देवी पुराण के अनुसार, भगवान शिव ने मां सिद्धिदात्री की कृपा से ही सिद्धियों को प्राप्त किया था। इसलिए भगवान शिव का आधा शरीर देवी का है और इसी कारण उन्हें ‘अर्धनारीश्वर’ कहा जाता है। मां दुर्गा के नौ रूपों में से यह रूप सर्वाधिक शक्तिशाली माना गया है।
श्रीदुर्गासप्तशती में पाठविधि के अन्तर्गत देवी-कवच आता है, जिसमें देवी के नौ स्वरूपों का उल्लेख मिलता है । इसमें बताया गया है कि “ देवी की नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं ।” माँ सिद्धिदात्री के बारे में लिखा है कि वे सिद्धि अर्थात् मोक्ष को देने वाली होने से सिद्धिदात्री कहलाती हैं । नवरात्रि में अष्टमी और नवमी तिथि (दिन) का विशेष महत्व होता है । कुछ लोग अष्टमी के दिन और कुछ लोग नवमी के नवरात्र व्रत का पारण करते हैं अर्थात् व्रत का समापन करते हैं । नवरात्रि के अंतिम दिन कन्या-पूजन का विधान हैं । वैदिक विधान के अनुसार दो से दस वर्ष तक की कन्याओं को उपयुक्त माना जाता है । सनातन धर्म में कन्याएं देवीरूपिणी मानी जाती हैं, क्योंकि वे निर्विकार व पवित्र होती हैं । कहा जाता है कि इस दिन माँ दुर्गा स्वयं कन्या के रूप में भोजन ग्रहण करने अपने भक्तों के घर पर आती हैं । शास्त्रों में बताया गया है कि भगवती दुर्गा हवन, पूजन, जप और दान से भी इतनी प्रसन्न नहीं होतीं, जितनी वे कन्यारूपी देवी के पूजन से होती हैं । इन कन्याओं को साधारण बोलचाल की भाषा में कंजकां भी कहा जाता है । कंजकां अर्थात् कन्यका । तंत्र ग्रंथों के अनुसार कन्यकाओं को पूज कर उन्हें भोजन कराने से देवी आनन्दित होती हैं व उस घर में वे निवास करती हैं । देवी भगवती के प्रसन्न होने से तीनों लोक तृप्त हो जाते हैं । कुछ लोग अष्टमी के दिन और कुछ लोग नवमी के दिन कन्यकाओं का पूजन करके उन्हें श्रद्धा व प्रेम से भोजन कराते हैं । ऐसी परम्परा है कि भोजन में पूरी, काला चना और आटे का हलवा अवश्य होता है ।
मां सिद्धिदात्री का स्वरूप

माँ के इस स्वरूप में देवी दुर्गा की चार भुजाएँ हैं । माँ अपने हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल का पुष्प धारण करती हैं । माँ का वाहन सिंह है । वे कमलपुष्प पर भी विराजमान होती हैं । माँ का यह स्वरूप अत्यन्त शुभ, दिव्य और परम कल्याणकारी माना जाता है ।
माँ के सभी नौ रूप स्त्री के विकासक्रम को दर्शाते हैं – जैसे पुत्रीरूप में उनका उत्पन्न होना, व्रत व तप करते भगवान शिव को वर रूप में पाने की इच्छा रखना और इसके लिये तपस्या करना, किशोरी होने पर चन्द्रमा की शीतल कांति से युक्त होना एवं उसके बाद सृजनशक्ति का प्रादुर्भाव होना, पत्नी व माता बनना, शक्ति से युक्त होकर देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये कात्यायनी रूप में प्रकट होना, दैत्यों के लिये कालरात्रि बनना, संसार को भयमुक्त करके आनन्दित करना और साधकों को सब प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करके उन्हें पूरी तरह तृप्त करना । माता के नौ रूपों में नारी के विकासक्रम की भी झलक मिलती है । संसार की सब स्त्रियों में माँ जगदम्बा का रूप किसी न किसी अंश में समाहित है, इसलिये सनातन संस्कृति नारी को मातृशक्ति कह कर पुकारती है ।
नवरात्रि के अंतिम दिन साधक का ध्यान सहस्रार चक्र पर स्थिर होता है,जो हमारे कपाल के मध्य में स्थित होता है। इस चक्र पर ध्यान केंद्रित करने से जीवन के सभी बंधनों और दुखों से मुक्ति मिलती है। इतना ही नहीं, इससे परम शांति और आत्मज्ञान की प्राप्ति भी होती है ।
नवरात्रि के नौंवे दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा से नवरात्रि व्रत का पूर्ण फल मिलता है और सभी कार्य सिद्ध होते हैं। इतना ही नहीं भक्तों की लौकिक और पारलौकिक मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। मां के इस स्वरूप की उपासना करने से बुरे कर्मों से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है । मां का भक्त सांसारिक इच्छाओं से ऊपर उठ जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। माँ दुर्गा के भक्त व साधक श्रद्धा और विश्वास रखते हैं कि माँ सिद्धिदात्री उनकी सभी मनोकामनाएँ पूरी करती हैं । सच तो यह है कि माँ का साधक सांसारिक इच्छाओं से ऊपर उठ जाता है । उसे यह बोध हो जाता है कि संसार में कुछ सार नहीं है । वह सुखों का भोग तो करता है, पर उन सुखों से बंधता नहीं है, उनसे अलिप्त रहता है । उसे देवी की कृपा का निरन्तर अनुभव करता है और माँ का यह सतत स्मरण उसे मोक्ष के मार्ग पर ले जाता है ।

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