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माँ ब्रह्मचारिणी

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नवरात्रों की कथायें

नवरात्रि के दूसरे दिन माँ दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा की जाती है। ‘ब्रह्म’ का अर्थ तपस्या होता है। माँ ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने हेतु वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। उनकी यह तपस्या इतनी कठोर थी कि उनका देह तक क्षीण होने लगा था। इसी कारण उनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा। ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली होता है। माँ ब्रह्मचारिणी को ज्ञान और तप की देवी भी कहा जाता है। आज हम इस ब्लॉग में जानेंगे कि देवी ब्रह्मचारिणी कौन हैं और उनकी कथा क्या है।

माँ ब्रह्मचारिणी का स्वरूप

इस स्वरूप में माँ ने श्वेत वस्त्र धारण किए हैं। उनके दाहिने हाथ में जपमाला और बाएँ हाथ में कमंडल है। माँ का वाहन सिंह है और देवी का यह स्वरूप ज्योर्तिमय है। माँ ब्रह्मचारिणी के अन्य नाम तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा हैं। माँ का यह स्वरूप अत्यंत सौम्य और शांति प्रदान करने वाला है।

माँ ने अपने अटल तप से भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। इसलिए जो भी माँ के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की उपासना करता है, उसके सभी संकल्प अवश्य पूर्ण होते हैं। इतना ही नहीं, आदि और व्याधि रोगों से भी मुक्ति मिलती है। मान्यता है कि माँ ब्रह्मचारिणी के पूजन से भगवान शिव भी प्रसन्न होते हैं और साधक को दांपत्य सुख, लंबी आयु और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

माँ ब्रह्मचारिणी को गुड़हल और कमल के फूल अत्यंत प्रिय हैं। माता के इस स्वरूप को चीनी का भोग लगाया जाता है, जिससे लंबी आयु, सौभाग्य और पारिवारिक सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। कहा जाता है कि माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से व्यक्ति को जीवन की हर कठिन परिस्थिति का डटकर सामना करने की क्षमता मिलती है और उसे सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।

माँ ब्रह्मचारिणी की कथा

माँ ब्रह्मचारिणी अपने पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं और उनका नाम सती था। सती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए वर्षों तक तपस्या की थी और उसी तपस्या के फलस्वरूप उनका विवाह भगवान शिव के साथ हुआ। किन्तु प्रजापति दक्ष भगवान शिव को अपने दामाद के रूप में स्वीकार नहीं कर पाए। एक दिन प्रजापति दक्ष ने एक महा यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने सती और भगवान शिव को छोड़कर समस्त देवताओं को आमंत्रित किया।

सती (अर्थात शैलपुत्री) बिना बुलाए ही अकेले उस महा यज्ञ में सम्मिलित होने चली गईं। यज्ञ में पहुँचकर सती ने देखा कि उनके पिता भगवान शिव के प्रति कटु वचन कह रहे हैं। पति शिव का यह अपमान देखकर सती क्रोधित हो उठीं और योगाग्नि प्रकट कर उसमें समा गईं। देह त्यागने से पूर्व सती ने पुनः जन्म लेकर भगवान शिव को ही पति रूप में प्राप्त करने का संकल्प लिया।

सती के दृढ़ संकल्प के फलस्वरूप उनका दूसरा जन्म पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में हुआ। पूर्व जन्म की तरह इस जन्म में भी पार्वती भगवान शिव के प्रति आकर्षित थीं। अपनी पुत्री के विवाह को लेकर चिंतित हिमालयराज को जब नारद मुनि ने भगवान शिव की उपासना का उपाय सुझाया, तब हिमालयराज ने बड़े आनंद से अपनी पुत्री पार्वती को शिव की उपासना के लिए अनुमति प्रदान की।

सती के देह त्याग देने के बाद भगवान शिव संसार से विलुप्त होकर वर्षों तक तपस्या में लीन रहे। पार्वती ने तपस्वी भगवान शिव की अत्यंत निष्ठा और समर्पण भाव से सेवा की। किंतु जब भगवान शिव तपस्या से नहीं उठे, तब इंद्र ने उन्हें मोहित करने के लिए कामदेव को भेजा। परंतु कामदेव के पुष्पबाण छोड़ने पर भगवान शिव क्रोधित हो उठे और अपनी तीसरी नेत्र की ज्वाला से उन्हें भस्म कर दिया।

इसके बाद भगवान शिव कहीं और चले गए और माँ पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या का आरंभ किया। इसी तपस्या के कारण माँ पार्वती माँ ब्रह्मचारिणी कहलाईं।

कहा जाता है कि माँ पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हजारों वर्षों तक केवल फल-फूल खाकर तपस्या की। इसके बाद सौ वर्षों तक उन्होंने केवल कंद-मूल का सेवन किया। वर्षों तक वे चिलचिलाती धूप, मूसलाधार वर्षा और कड़ाके की ठंड जैसी कठिन परिस्थितियों में भी अपनी तपस्या में लीन रहीं।

तीन हज़ार वर्षों तक उन्होंने केवल बेलपत्र का सेवन किया। इसके पश्चात उन्होंने बेलपत्र का भी त्याग कर दिया, जिसके कारण उन्हें अपर्णा कहा गया। बेलपत्र छोड़ने के बाद वे वर्षों तक केवल जल का सेवन करती रहीं। इतने कष्ट सहने के बाद भी माँ पार्वती अपने संकल्प पर अडिग रहीं। अंततः उन्होंने जल का भी त्याग कर दिया, किंतु भगवान शिव की आराधना करना नहीं छोड़ा।

माँ पार्वती की माता रानी मैना ने जब अपनी पुत्री को इतनी कठोर तपस्या करते देखा, तो उसे रोकते हुए कहा—“उमा” (अर्थात् ऐसा मत करो)। इसी कारण उनका एक और नाम उमा पड़ा।

इतनी कठिन तपस्या से माँ पार्वती का शरीर अत्यंत क्षीण हो गया। उनकी इस तपस्या को सभी देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों ने अभूतपूर्व बताया। स्वयं ब्रह्मा जी ने आकाशवाणी द्वारा उन्हें कहा:  

“देवी! आज तक इस जगत में किसी ने इतनी कठोर तपस्या नहीं की। आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी और आपको भगवान शिव पति के रूप में अवश्य प्राप्त होंगे।”

अंततः माँ पार्वती की कठोर तपस्या के फलस्वरूप भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। माँ ब्रह्मचारिणी का यह स्वरूप उपासकों को सिखाता है कि जीवन में कठिन परिस्थितियों में भी अपने संकल्प से विचलित नहीं होना चाहिए।

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