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मां महागौरी

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नवरात्रों की कथायें

नवरात्रि का आठवां दिन मां दुर्गा के महागौरी स्वरूप को समर्पित है। विधि-विधान से मां की पूजा करने पर सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं और जीवन में आ रही कठिनाइयाँ दूर होती हैं। इस दिन कन्याओं को भोजन कराने से धन-समृद्धि के योग बनते हैं। मां का यह स्वरूप अत्यंत गोरा है, यही कारण है कि उन्हें महागौरी कहा जाता है। उन्हें श्वेतांबरधरा और अन्नपूर्णा का स्वरूप भी कहा जाता है।

इस ब्लॉग में हम आपको मां महागौरी के स्वरूप, उनकी उपासना से मिलने वाले आशीर्वाद और मां महागौरी की कथा के बारे में जानकारी प्रदान करेंगे।

मां महागौरी का स्वरूप

मां महागौरी श्वेत वस्त्र धारण करती हैं। उनकी चार भुजाएं हैं। मां का ऊपरी दायां हाथ अभय मुद्रा में है, जबकि नीचे वाले हाथ में वे त्रिशूल धारण करती हैं। ऊपर वाले बाएं हाथ में डमरू है और नीचे का बायां हाथ वर मुद्रा में है। मां का यह स्वरूप अत्यंत शांतिपूर्ण है। उनके इस रूप की तुलना शंख, चंद्रमा और कुंद के फूल से की जाती है। मां महागौरी की उपासना से साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है।

एक मान्यता के अनुसार, मां का वाहन बैल और सिंह दोनों हैं। एक कथा के अनुसार, एक सिंह अत्यंत भूखा था। भोजन की तलाश में वह तपस्या में लीन मां के पास जा पहुँचा और उनकी तपस्या पूर्ण होने का इंतज़ार करते हुए वहीं बैठ गया। इस लंबे इंतज़ार में वह बहुत निर्बल हो गया। जब देवी तपस्या से उठीं तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर दया आ गई और उन्होंने उसे अपनी सवारी बना लिया। वाहन वृषभ के कारण मां को वृषारूढ़ा भी कहा जाता है। अष्टमी पर केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि देव, दानव, यक्ष, नाग और किन्नर भी मां की पूजा करते हैं। इस दिन मां की आराधना से जीवन सुख, वैभव और धन-धान्य से परिपूर्ण होता है। साथ ही सभी प्रकार की व्याधियों से मुक्ति मिलती है।

मां महागौरी की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, सती के रूप में देह त्याग करने के बाद मां पर्वतराज हिमालय के यहां पार्वती के रूप में जन्म लेती हैं। मां पार्वती को आठ वर्ष की आयु में ही अपने पूर्व जन्म की घटनाएँ स्मरण होने लगीं। इसी कारण उन्होंने भगवान शिव को अपना पति मान लिया और उन्हें पाने के लिए कठोर तपस्या करने का निश्चय किया। मां पार्वती ने वर्षों तक निराहार रहीं औरजल भी ग्रहण नहीं किया । उन्होंने अत्यन्त कठोर   तपस्या की, जिसके कारण उनका गौर शरीर काला पड़ गया।

मां पार्वती की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने मां पार्वती को गंगा के पवित्र जल से शुद्ध किया, जिससे उनका शरीर अत्यंत तेजस्वी और गौर हो गया। तभी से उन्हें महागौरी कहा जाने लगा। 

दुर्गा अष्टमी व्रत कथा के अनुसार, मां पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। एक बार भगवान शिव ने उन्हें देखकर कुछ कह दिया था, जिससे आहत होकर देवी पार्वती तपस्या में लीन हो गईं। जब वर्षों बीत जाने पर भी मां पार्वती वापस नहीं आईं, तब भगवान शिव स्वयं उनके पास पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि मां चांदनी की तरह श्वेत दिखाई दे रही थीं। यह देख भगवान शिव ने उन्हें गौर वर्ण का वरदान दिया।

एक अन्य कथा के अनुसार, प्राचीन काल में शुंभ और निशुंभ नामक राक्षसों ने संसार में उत्पात मचाया था। उनका वध केवल देवी ही कर सकती थीं। उनके वध के लिए भगवान शिव ने मां का शरीर काला कर दिया था। राक्षसों के वध के बाद अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करने हेतु मां ने कठोर तपस्या की। जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें मानसरोवर में स्नान करने का निर्देश दिया। स्नान के पश्चात मां का शरीर पुनः गौर वर्ण का हो गया। मां महागौरी के इस स्वरूप की उपासना से साधक के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इतना ही नहीं, पूर्व जन्मों के पाप भी धूल जाते हैं। मान्यता है कि मां महागौरी राहु ग्रह पर नियंत्रण रखती हैं, इसलिए कुंडली में राहु दोष दूर करने के लिए उनकी आराधना आवश्यक मानी जाती है। मां महागौरी की पूजा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। मां की पूजा से साधक के जीवन में मंगल और सौभाग्य का संचार होता है।

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