कथाकुंज

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माँ कात्यायनी

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नवरात्रों की कथायें

नवरात्रि के छठे दिन मां दुर्गा के कात्यायनी स्वरूप की आराधना की जाती है । मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी कही जाती हैं। मान्यता है कि इस दिन मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना करने से जीवन में सुख-समृद्धि और सौभाग्य प्राप्त होती है। विशेष रूप से, विवाह से जुड़ी समस्याएं दूर होती हैं और विवाह के योग मजबूत बनते हैं। 

मां कात्यायनी का स्वरूप यश और सफलता का प्रतीक माना जाता है। उनकी भक्ति करने से न केवल पारिवारिक जीवन में प्रसन्नता आती है, बल्कि मनुष्य को आध्यात्मिक शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा भी प्राप्त होती है। इस ब्लॉग में हम मां कात्यायनी के स्वरूप, मां कात्यायनी की कथा और उनकी आराधना से मिलने वाले आशीर्वाद के बारे में विस्तार से जानेंगे ।

मां कात्यायनी का स्वरूप

माँ दुर्गा का कात्यायनी का स्वरूप बहुत भव्य और दिव्य है । इस रूप में उनके चार हाथ हैं । भक्तों के संकट दूर करने वाली माँ का दायीं ओर का ऊपर वाला हाथ भक्तों को अभय देने वाली मुद्रा में ऊपर उठा हुआ है । वे आशीर्वाद भी दे रही हैं । उनका दायीं ओर का नीचे वाला हाथ वरद मुद्रा में है । इसी तरह देवी के बायीं ओर के ऊपर वाले हाथ में तलवार है तथा उनके बायीं ओर के नीचे वाले हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित है । उनके पूजन से उपासक के मन में अद्भुत शक्ति का संचार होता है। मां के सिर पर सदैव मुकुट सुशोभित रहता है और वे सिंह पर सवार होकर अपने भक्तों की रक्षा करती हैं।

नवरात्रि के छठे दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होता है। आज्ञा चक्र दोनों भृकुटियों के मध्य में स्थित है। यह वह स्थान है, जहाँ मन और बुद्धि का मिलन होता है । आज्ञा चक्र के जागृत होने पर साधक को भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का आभास पहले ही हो जाता है।

माँ कात्यायनी की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में कात्य गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे । उन्होंने मां भगवती की बहुत वर्षों तक कठोर तपस्या की । उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां भगवती ने उन्हें दर्शन दिए और वर माँगने के लिए कहा । महर्षि कात्यायन ने अपनी इच्छा प्रकट करते हुए मां भगवती से पुत्री रूप में उनके घर जन्म लेने की प्रार्थना की । मां ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार किया और आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन उनके घर पुत्री रूप में अवतरित हुईं । महर्षि कात्यायन की पुत्री होने के कारण ही मां को कात्यायनी कहा गया ।

एक कथा यह भी है कि जब संसार में महिषासुर का अत्याचार बढ़ गया, तब देवी-देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश से सहायता मांगी। इस पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने-अपने तेज का अंश देकर एक देवी को उत्पन्न किया । तब सबसे पहले महर्षि कात्यायन ने इनकी पूजा की । इसलिये वे कात्यायनी कहलायीं ।

महिषासुर को वरदान प्राप्त था कि युद्ध में कोई भी पुरुष, चाहे वह देवता ही क्यों न हो, उसे पराजित नहीं कर सकता । उसका वध केवल किसी स्त्री के हाथों ही संभव था । वास्तव में बात यह थी कि वह स्त्री को केवल कोमल समझता था और उसका मानना था कि स्त्री युद्ध तो कर नहीं सकती, अत: उसे मार ही कैसे सकती है । इसलिए वह स्वयं को अजेय यानी अमर समझता था । उसके इसी अहंकार से उसने संसार भर में आतंक मचा दिया था । उसके निरन्तर अत्याचारों से समूचा संसार त्राहि-त्राहि कर उठा था । तभी मां कात्यायनी ने महिषासुर के वध के लिए अवतार लिया ।

जन्म के बाद महर्षि कात्यायन के आश्रम में पूजन के उपरांत मां कात्यायनी सिंह पर सवार होकर महिषासुर से युद्ध करने गईं । नौ दिनों के घोर संग्राम के बाद  दशमी तिथि को उन्होंने महिषासुर का वध किया और संसार में शांति हुई । माँ ने पुनः धर्म की स्थापना की । इसी कारण उन्हें महिषासुरमर्दिनी भी कहा जाता है। महिषासुरमर्दिनी का अर्थ है – महिषासुर का वध करने वाली।

कुँवारी कन्याएं बड़ी श्रद्धा और चाव से माँ कात्यायनी की पूजा और व्रत करती हैं । उनका यह विश्वास है कि माँ उनसे प्रसन्न होने पर उन्हें सुंदर और सुयोग्य पति पाने का वरदान देंगीं । यह रीति बड़े पुराने समय से चली आ रही है । भगवान कृष्ण के बालरूप की कथाओं में पढ़ने को मिलता है कि  एक बार बालक कृष्ण अपने पिता नन्दबाबा को वरुणलोक से बचा कर वापिस ले आये थे । उस समय ब्रजवासी बहुत घबराये हुए थे । यह देख कर बालक कृष्ण ने सभी गोप-गोपियों को अपने नारायण रूप के और वैकुण्ठलोक के दर्शन करा दिये, जिससे वे सभी स्वस्थ हो गये । उनके हरि रूप की चर्चा ब्रज की बालिकाएँ करने लगीं । वे गोपियाँ  कृष्ण का वरण करना चाहतीं थीं अर्थात् उन्हें पति रूप में पाना चाहतीं थीं । और इसके लिये उन्होंने यमुना नदी के तट पर माँ कात्यायनी की पूजा की । तब से कुमारी कन्याएं इनकी पूजा करती हैं । ब्रजमण्डल में माँ कात्यायनी का वास सदा ही रहता है ।

मां कात्यायनी शक्ति का वह स्वरूप हैं, जो बुराइयों का नाश करती हैं और अपने भक्तों की रक्षा करती हैं । जो कोई भी भक्त या साधक सच्चे मन से माता कात्यायनी का ध्यान करता है और उनकी शरण में चला जाता है, माँ उसे मनोवांछित फल देती है । उसके पाप व रोग-शोक सब दूर हो जाते हैं । उसका जीवन धर्ममय हो जाता है । मान्यता है कि मां कात्यायनी की उपासना से व्यक्ति अपनी सभी इन्द्रियों को वश में कर सकता है । नवरात्रि में यदि कोई व्यक्ति मां कात्यायनी का विधि-विधान से व्रत करता है, तो उसे रोग, शोक और भय से मुक्ति मिलती है। देवी पुराण के अनुसार मां कात्यायनी की पूजा करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है । उनके साधक का मन एकाग्र होकर आज्ञा चक्र में पहुँच जाता है । और यह माना जाता है कि ऐसे साधक को माँ कात्यायनी के दर्शन भी हो जाते हैं ।

मां कात्यायनी पीठ

वृंदावन में मां कात्यायनी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है, जो 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यहां माता सती के केश गिरे थे। ऐसा माना जाता है कि यहां मां कात्यायनी के दर्शन और पूजा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

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